केवल महादेव: शब्दों से परे, श्लोकों में शिव
जहाँ कुछ भी नहीं था,
वहाँ भी महादेव थे।
और जहाँ सब कुछ दिखाई देता है,
वहाँ भी वही हैं।
महादेव किसी कथा के पात्र नहीं।
वे कथा से पहले की शांति हैं
और कथा के बाद का मौन।
📜 श्लोक 1 — शिव की निरपेक्षता
भावार्थ :
शिव किसी भावना से बँधे नहीं।
न आकर्षण, न विरक्ति।
न लक्ष्य, न उपलब्धि।
वे केवल चेतना और आनंद का स्वरूप हैं।
महादेव को किसी की आवश्यकता नहीं,
क्योंकि आवश्यकता अपूर्णता का संकेत है।
और शिव पूर्ण हैं।
वे अकेले हैं,
पर एकाकी नहीं।
क्योंकि जो सबका आधार हो,
वह कभी अकेला नहीं होता।
📜 श्लोक 2 — शिव का “होना”
भावार्थ :
शिव अजन्मा हैं,
नित्य हैं,
सनातन हैं।
देह बदले, समय बदले —
शिव नहीं बदलते।
महादेव न अच्छे हैं,
न बुरे।
ये शब्द मानव के हैं,
सत्य के नहीं।
शिव तो संतुलन हैं —
जहाँ न पक्ष है,
न विरोध।
📜 श्लोक 3 — शिव का मौन
भावार्थ :
जहाँ शब्द समाप्त होते हैं,
वहीं शिव प्रकट होते हैं।
मौन किसी उत्तर की कमी नहीं,
सत्य की पूर्णता है।
महादेव उत्तर नहीं देते,
क्योंकि उत्तर प्रश्न को जीवित रखता है।
शिव प्रश्न को ही गिरा देते हैं।
वे न पुरस्कार देते हैं,
न दंड।
वे केवल परिणाम को होने देते हैं।
📜 श्लोक 4 — शिव की व्यापकता
भावार्थ :
जहाँ सम्पूर्ण सृष्टि
एक ही आश्रय में टिकती है —
वही शिव है।
महादेव को पूजा की आवश्यकता नहीं,
क्योंकि पूजा दूरी बनाती है।
और शिव दूरी नहीं,
समीपता हैं।
उन्हें पाना नहीं पड़ता,
उन्हें खोया भी नहीं जा सकता।
क्योंकि
जहाँ कुछ भी है —
वहाँ महादेव हैं।
🕯️ अंतिम सत्य
महादेव किसी के लिए नहीं।
महादेव किसी के विरुद्ध नहीं।
महादेव
बस महादेव हैं।
हर हर महादेव 🔱
Comments
Post a Comment