मैं और मेरे महादेव: जब से जाना, तब से माँगना छूट गया

जब से मैंने अपने महादेव को जाना है,
तब से कुछ माँगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

न इसलिए कि सब मिल गया,
बल्कि इसलिए कि
अब भरोसा आ गया।

मैं अब उनके सामने बैठता हूँ,
तो शब्द नहीं ढूँढता।
क्योंकि जो सब समझते हों,
उन्हें समझाना नहीं पड़ता।

मेरे महादेव जानते हैं
मेरे लिए क्या अच्छा है
और क्या बुरा।
क्या देना है
और क्या नहीं।


कभी उन्होंने मुझे वो दिया
जो मैंने कभी माँगा ही नहीं था,
और वही आगे चलकर
मेरी सबसे बड़ी ताक़त बन गया।

कभी उन्होंने वो नहीं दिया
जिसे मैं बहुत चाहता था,
और समय ने मुझे सिखाया
कि अगर वो मिल जाता
तो शायद मैं बिखर जाता।

तभी समझ आया —
महादेव हमेशा देते नहीं,
कभी-कभी बचाते हैं।


अब मेरी प्रार्थना में
कोई सूची नहीं होती।
कोई शर्त नहीं होती।

बस एक भाव होता है —

“जो मेरे लिए ठीक हो,
वही रखना।
और जो मुझे नुकसान पहुँचाए,
चाहे वो मेरी ही चाह क्यों न हो,
उसे मुझसे दूर रखना।”


मैंने उनसे कभी शिकायत नहीं की।
क्योंकि
जिसे सौंप दिया हो खुद को,
उससे हिसाब नहीं माँगा जाता।

जो मिला,
उसमें भी महादेव।
जो नहीं मिला,
उसमें भी महादेव।


आज मैं शांत हूँ।
क्योंकि मुझे पता है —
मेरे महादेव
कभी देर कर सकते हैं,
पर गलत नहीं करते।

और जब इंसान
इतना मान ले,
तो फिर माँगने के लिए
कुछ बचता ही नहीं।


🕯️ मेरी भक्ति माँगने की नहीं है,
मेरी भक्ति भरोसे की है।

बस मैं
और मेरे महादेव।

हर हर महादेव 🔱

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